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भक्त नरसी मेहता का पावन चरित्र: जब भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं भरा था नरसी का भात

हमारी वेबसाइट सनातन धर्म के ज्ञान की पावन नदी है। इस धारा में आज हम जिस अमूल्य रत्न की चर्चा कर रहे हैं, वह हैं “भक्त नरसी मेहता की जीवनी” और उनकी वही अद्भुत लीला – जब भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं उनके घर “भात” (ममेरु) भरकर अपने भक्त का मान रखा। यह केवल लोककथा नहीं, बल्कि भक्ति, विश्वास और भगवान की भक्तवत्सलता का जीवंत प्रतीक है।

भक्त नरसी मेहता की जीवनी: जन्म, परिवार और प्रारंभिक जीवन

“भक्त नरसी मेहता की जीवनी” का आरंभ सौराष्ट्र की पावन भूमि से होता है। ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार नरसी मेहता का जन्म लगभग 1414 ईस्वी (विक्रम संवत 1471) में गुजरात के भावनगर ज़िले के पास तलाजा गाँव में हुआ। उनके पिता का नाम श्री कृष्णदास (कहीं-कहीं दामोदरदास) और माता का नाम लक्ष्मी गौरी बताया जाता है। बाल्यकाल में ही, लगभग पाँच वर्ष की आयु में, माता-पिता दोनों का देहांत हो गया, जिससे वे अनाथ हो गए और बड़े भाई तथा भाभी के संरक्षण में पले-बढ़े।

भक्तचरित्र ग्रंथों और लोकपरंपरा में वर्णित है कि नरसी आठ वर्ष की आयु तक बोल नहीं पाते थे। एक दिन एक संत उनके घर आए और “राधे श्याम, राधे श्याम” का कीर्तन कर रहे थे। नरसी बालक उस कीर्तन में ऐसे तल्लीन हुए कि स्वयं उनके मुख से भी “राधे श्याम” शब्द फूट पड़े और उसी क्षण से उनकी वाणी खुल गई। यह घटना उनकी भक्ति-यात्रा का पहला चमत्कारी मोड़ मानी जाती है। जैसे श्रीमद्भागवत महापुराण (10.2.16) में कहा गया है –

“भगवानपि विश्वात्मा भक्तानामभयङ्करः। आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभेः॥”

अर्थात् भगवान स्वयं भक्तों के हृदय में प्रवेश कर उन्हें निर्भय बनाते हैं। नरसी की वाणी का खुलना भी इसी कृपा की झलक समझी जाती है।

कृष्ण-भक्ति में डूबा जीवन और संसार से विरक्ति

युवा होने पर लगभग 15 वर्ष की आयु में नरसी मेहता का विवाह माणेकबाई से हुआ। उनसे उन्हें एक पुत्र शामलदास और एक पुत्री कुंवरबाई (जिसे कई परंपराओं में “नानी बाई” कहा जाता है) हुए। परंतु “भक्त नरसी मेहता की जीवनी” का मूल स्वर संसारिक नहीं, पूर्णतः आध्यात्मिक है। वे गृहस्थ होते हुए भी अंतःकरण से विरक्त वैष्णव संत थे।

नरसी का स्वभाव बचपन से ही एकांतप्रिय और भगवत-चिंतन में लीन रहने वाला था। अनेक लोककथाओं में आता है कि वे अक्सर किसी मंदिर, नदी-तट या वन में जाकर श्रीकृष्ण के नाम का जप-कीर्तन करने लगते, और घंटों-घंटों तक भजन में डूबे रहते। इस कारण घर-परिवार के लोग, विशेषतः भाभी दुरिता गौरी, उन्हें ताने देतीं – “घर की चिंता नहीं, केवल कान्हा-कान्हा जपते रहते हो!”

यह स्थिति हमें महाभारत के भीष्मपर्व में वर्णित अर्जुन के मोह से भिन्न, परंतु गीता के निष्काम कर्मयोग की याद दिलाती है। नरसी भी गीता के आदर्श “मय्यर्पितमनोबुद्धिः” (मन-बुद्धि मुझे अर्पित कर) के अनुसार अपना मन-कर्म सब श्रीकृष्ण पर समर्पित करना चाहते थे। सांसारिक उपेक्षा और तिरस्कार के बीच भी उनकी भक्ति की धारा रुक न सकी।

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नरसी मेहता की साधना: गिरनार की लीला और श्रीकृष्ण का साक्षात् अनुभव

भक्त परंपरा में एक प्रसिद्ध आख्यान आता है कि जब घरवालों की उपेक्षा अत्यधिक बढ़ गई, तो नरसी मेहता विरक्त होकर भगवान का साक्षात् दर्शन पाने की लालसा से गिरनार पर्वत की ओर चले गए। वहाँ कई दिन तक कठोर तप, जप और भजन में लीन रहे। अंततः उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर स्वयं श्रीकृष्ण ने उन्हें दर्शन दिए और अपने गोलोक की रासलीला का साक्षात् अनुभव कराया।

यद्यपि यह घटना किसी एक प्रामाणिक शास्त्र में विस्तार से नहीं, बल्कि गुजरात की वैष्णव लोक-परंपरा, कीर्तन और “वार्ता” साहित्य (जैसे बाद में रचित भक्तविजय आदि) में वर्णित है; फिर भी इसका आध्यात्मिक संदेश गहरा है – जो श्रीमद्भागवत महापुराण के दसवें स्कंध में वर्णित वृन्दावन-लीलाओं से पूर्ण साम्य रखता है। नरसी ने अपने अनेक पदों में उस दिव्य रास, मुरली की ध्वनि और गोपियों के प्रेम का वर्णन किया है, मानो वे स्वयं उस लीला के प्रत्यक्ष साक्षी हों।

यहीं से उनका जीवन पूर्णतः “कृष्ण-दास्य” में बदल गया। वे स्वयं को “हरि का दास नरसी” कहकर पुकारते और गाते। उनकी वाणी से निकले पद केवल काव्य नहीं, हृदय से निकली अनुभूति थे।

भक्त नरसी मेहता की रचनाएँ और “वैष्णव जन तो…” का संदेश

“भक्त नरसी मेहता की जीवनी” का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष उनकी साहित्यिक और भजन-परंपरा है। उन्हें “गुजराती आदिकवि” कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने पहली बार सरल गुजराती में गहन भक्ति और दर्शन को गाया। उनकी प्रमुख रचनाओं में – वैष्णव जन तो तेणे कहिये…, राससहस्रपदी, हारमाला, श्रृंगारमाला, वसंतनां पदो, और विशेष रूप से मामेरु (भात) के पद उल्लेखनीय हैं।

उनका प्रसिद्ध भजन “वैष्णव जन तो तेणे कहिये…” महात्मा गांधी का प्रिय भजन रहा, जो आज भी भारतीय जनमानस में करुणा, सेवा और निष्काम भक्ति का घोष बनकर गूँजता है। इसमें वे सच्चे वैष्णव के लक्षण बताते हैं – जो परपीड़ा से दुखी होता है, किसी का अपमान नहीं करता, लोभ-मोह से रहित रहता है। यह भाव भगवद्गीता के “अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च” (गीता 12.13) से मेल खाता है।

नरसी की भक्ति केवल मंदिर की परिधि में सीमित नहीं थी; वे जाति-पाँति के भेद से ऊपर उठकर हरिजन और साधारण जनता के बीच बैठकर भी कीर्तन करते थे। इस कारण तथाकथित उच्च-वर्गीय ब्राह्मणों ने उन्हें कई बार बहिष्कृत करने की चेष्टा की, पर उन्होंने श्रीकृष्ण के नाम का दामन नहीं छोड़ा।

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कुंवरबाई के ममेरे (भात) की पावन कथा: जब श्रीकृष्ण ने स्वयं भरा नरसी का भात

अब आते हैं इस लेख के मुख्य प्रश्न पर – “जब भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं भरा था नरसी का भात” – यह क्या घटना थी? गुजरात की लोकभक्ति परंपरा में “कुंवरबाई का ममेरू” (या “नानी बाई का मायराँ”) के नाम से जो कथा गाई जाती है, वह नरसी की अटूट श्रद्धा और भगवान की अपरंपार भक्तवत्सलता का अद्भुत उदाहरण है।

परिवार-परंपरा के अनुसार, जब पुत्री के ससुराल में प्रथम बार गर्भावस्था आती है, तो मायके की ओर से बड़े प्रेम और मान-सम्मान से “ममेरू” या “भात” भेजा जाता है – जिसमें वस्त्र, आभूषण, मिठाई, अन्न, धन आदि होते हैं। नरसी मेहता की पुत्री कुंवरबाई के लिए भी यह अवसर आया। समाज में नरसी का स्थान तो महान संत का था, पर आर्थिक दृष्टि से वे अत्यंत साधारण, बल्कि दरिद्र थे।

जब ससुराल से संदेश आया कि अमुक तिथि को ममेरू भेजना है, तो घर में हाहाकार मच गया। भाभी और रिश्तेदार ताने देने लगे – “कृष्ण-कृष्ण जपने से पेट भरता है क्या? अब देखो, बेटी का मान कैसे रखोगे?” नरसी के पास न धन, न आभूषण, न वस्त्र – केवल एक अमूल्य निधि थी, श्रीकृष्ण पर पूर्ण विश्वास।

वे श्रीकृष्ण के मंदिर में गए, वहाँ गिरधर गोपाल के चरणों में गिरकर रोते हुए बोले – “प्रभु! यह आपकी ही दी हुई पुत्री है। आज उसका संसार में मान रखना है। मेरे पास कुछ नहीं, केवल आपका नाम है। यदि आज भी आप न संभालें, तो दुनिया आपकी और मेरी भक्ति – दोनों की हँसी उड़ाएगी।”

इसी करुण पुकार पर भगवान की भक्तवत्सलता जाग उठी। जैसा कि श्रीमद्भागवत में प्रह्लाद की कथा में हम देखते हैं कि भगवान नृसिंह रूप में खंभे से प्रकट होकर अपने भक्त की रक्षा करते हैं, वैसे ही यहाँ भी उन्होंने अपने भक्त का मान रखने का निश्चय किया।

शामलशाह सेठ के रूप में श्रीकृष्ण का आगमन और भात की अद्भुत शोभा

लोककथाओं के अनुसार, उसी दिन नगर में एक अत्यंत धनाढ्य व्यापारी “शामलशाह सेठ” के रूप में एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए। उनके साथ असंख्य बैलगाड़ियाँ, घोड़े, सेवक, वस्त्र, आभूषण, अनाज की बोरियाँ, मिठाइयों के डिब्बे – सब कुछ था। वे सीधे नरसी मेहता के घर पहुँचे और बड़े आदर से बोले – “नरसीभाई! मुझे श्रीकृष्ण ने भेजा है कि कुंवरबाई के ममेरे की सारी व्यवस्था मैं करूँ। आप निश्चिंत होकर तैयार हो जाइए।”

घरवाले पहले तो चकित हुए, परंतु सेठ की सौम्यता, वैभव और कृपा देखकर मान लिया कि यह अवश्य ही भगवान की लीला है। नरसी ने हृदय से समझ लिया कि यह कोई साधारण सेठ नहीं, स्वयं उनका श्यामसुंदर है, जो “शामलशाह” बनकर आए हैं – जैसे महाभारत में श्रीकृष्ण कभी सारथी, कभी दूत, तो कभी सादे ग्वाले के रूप में पांडवों की रक्षा करते हैं।

कुंवरबाई के ससुराल की ओर जब यह ममेरू निकला, तो नगर के लोग देखते ही रह गए – इतनी बैलगाड़ियाँ, इतना धन-वैभव कि किसी राजा-महाराजा का भी ममेरू फीका पड़ जाए। ससुराल पक्ष ने भी सोचा – “हमने सुना था कि नरसी तो साधारण ब्राह्मण हैं, पर यह तो किसी समृद्ध राजवंश जैसा ममेरू है!”

कथा के कुछ संस्करणों में आता है कि स्वयं कुंवरबाई के ससुराल में “शामलशाह सेठ” ने जाकर सबको दर्शन दिए, दान-दक्षिणा बाँटी और फिर अंतर्धान हो गए। जब बाद में लोगों ने खोज की, तो ऐसा कोई सेठ कहीं मिला ही नहीं – तब सबको ज्ञात हुआ कि यह तो स्वयं द्वारकाधीश श्रीकृष्ण की लीला थी, जिन्होंने अपने प्रिय भक्त नरसी का मान रखने के लिए “भात” स्वयं भरा।

यह कथा मुख्यतः लोकभक्ति, कीर्तन और “ममेरे के पदों” में संरक्षित है; किसी एक प्राचीन शास्त्रीय ग्रंथ में इसका श्लोकबद्ध प्रमाण नहीं मिलता, परंतु भक्तविजय जैसे मराठी भक्तचरित्र-ग्रंथों और गुजरात की वार्ता-परंपरा में इस तरह की अनेक लीलाओं का संकेत अवश्य मिलता है।

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भात की लीला का आध्यात्मिक अर्थ: निःस्वार्थ भक्ति और भगवान की भक्तवत्सलता

“भक्त नरसी मेहता की जीवनी” में कुंवरबाई के ममेरे की यह कथा केवल चमत्कार की कहानी नहीं, बल्कि भक्ति के सिद्धांतों की जीवंत व्याख्या है। इस लीला से हमें तीन मुख्य आध्यात्मिक संदेश मिलते हैं –

  • पूर्ण समर्पण (शरणागति): नरसी के पास कोई सांसारिक साधन नहीं था, पर उन्होंने हताशा में भी अपना विश्वास नहीं छोड़ा। जैसे गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं – “सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज” – नरसी ने सचमुच सब उपाय छोड़कर केवल श्यामसुंदर की शरण ली।
  • भक्त की लाज भगवान की लाज: श्रीमद्भागवत में प्रह्लाद, ध्रुव, गजेंद्र आदि अनेक उदाहरण हैं जहाँ भगवान भक्त की लाज रखने के लिए स्वयं नियमों को भी तोड़ते प्रतीत होते हैं। होलिका-दहन की कथा में भी प्रह्लाद की रक्षा के लिए अग्नि का नियम बदल जाता है। इसी प्रकार यहाँ भी भगवान ने सामाजिक मान-प्रतिष्ठा के स्तर पर नरसी का मान रखा।
  • निश्काम भक्ति का प्रतिफल: नरसी ने कभी धन या वैभव के लिए कृष्ण-भक्ति नहीं की; उनका प्रेम केवल दर्शन और नाम-स्मरण के लिए था। परंतु जब समय आया कि बेटी का मान रखने के लिए धन आवश्यक था, तो वह धन भी स्वयं भगवान ने ही प्रदान किया।

इस कथा से यह भी स्पष्ट होता है कि भगवान के लिए जाति, कुल, पद, रूप कुछ नहीं; वे केवल हृदय की सच्चाई देखते हैं। जैसे भक्त मीराबाई ने कहा – “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोय” – वैसे ही नरसी के लिए भी सब कुछ केवल श्रीकृष्ण ही थे।

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समाज-सुधार, जाति-भेद के विरुद्ध स्वर और अंतिम समय

“भक्त नरसी मेहता की जीवनी” का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष उनका सामाजिक दृष्टिकोण है। उन्होंने अपने पदों और आचरण से यह स्पष्ट कर दिया कि सच्ची भक्ति किसी जाति या ऊँच-नीच की मोहताज नहीं। वे निम्न कही जाने वाली जातियों के लोगों के साथ बैठकर भी भजन करते, अछूतों के घर भी प्रसाद ग्रहण करते। इससे उस समय के कुछ ब्राह्मण समुदायों में रोष हुआ और उन्होंने नरसी का बहिष्कार करने तक का प्रयत्न किया।

परंतु नरसी ने गीता के “विद्या विनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि… पण्डिताः समदर्शिनः” (5.18) की भावना को जीते हुए, सबमें एक ही परमात्मा का दर्शन किया। वे कहते थे – “जिसके भीतर श्रीकृष्ण का वास है, वह कैसे नीच हो सकता है?” यह दृष्टि आज के समय में भी अत्यंत प्रासंगिक है, जब समाज बार-बार विभाजन की ओर बढ़ता है।

इतिहासकारों के अनुसार नरसी मेहता ने लगभग 1480–1481 ईस्वी के आसपास सौराष्ट्र के मांगरोल क्षेत्र में देह त्याग किया। अंतिम समय तक वे भजन-कीर्तन में लीन रहे। लोककथाओं में आता है कि देह छोड़ते समय भी उनके अधरों पर श्रीकृष्ण नाम और “वैष्णव जन तो…” जैसे पदों की धुन थी। यह वही अवस्था है, जिसे उपनिषद और गीता “अन्तकाले च मामेव स्मरन्” कहकर मोक्ष का मार्ग बताते हैं।

आज के भक्तों के लिए प्रेरणा: नरसी मेहता की भक्ति को कैसे अपनाएँ?

भक्त नरसी मेहता का पावन चरित्र हमें सिखाता है कि –

  • साधन सीमित हों तो भी विश्वास असीम होना चाहिए।
  • भक्ति केवल मंदिर में नहीं, समाज-सेवा, करुणा और सत्यनिष्ठा में भी प्रकट होनी चाहिए – जैसा उनके “वैष्णव जन तो…” में संदेश है।
  • कठिन समय में, विशेषकर जब मान-सम्मान दाँव पर हो, तब भी ईश्वर पर भरोसा नहीं छोड़ना चाहिए – कुंवरबाई के ममेरे की कथा इसका ज्वलंत उदाहरण है।
  • जाति, कुल, वर्ण से ऊपर उठकर हर जीव में श्रीकृष्ण का अंश देखना ही सच्ची वैष्णवता है।

यदि हम प्रतिदिन थोड़ी देर भी नरसी मेहता के पदों का स्मरण करें, “वैष्णव जन तो…” जैसे भजनों का अर्थ समझकर अपने जीवन में उतारें, और किसी भी संकट में पहले श्रीकृष्ण से हृदय से संवाद करें, तो यह भी नरसी की परंपरा का ही अनुसरण होगा।

अंततः, “भक्त नरसी मेहता की जीवनी” और “जब श्रीकृष्ण ने स्वयं भरा नरसी का भात” – दोनों मिलकर हमें यह भरोसा देते हैं कि – जो भक्त सच्चे मन से भगवान को पुकारता है, उसके “भात” को, उसके मान को, उसके जीवन को स्वयं भगवान संभाल लेते हैं। यही सनातन भक्ति का अमर संदेश है।

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