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भगवान जगन्नाथ के नाभि-मणि का रहस्य: नीलमाधव से रथयात्रा तक की अद्भुत कथा

जगन्नाथ नाभि मणि और नीलमाधव की पौराणिक कथा केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं, अपितु सनातन धर्म के उस परम गूढ़ रहस्य का उद्घाटन है जहाँ निराकार परब्रह्म स्वयं काष्ठ के सगुण विग्रह में समाहित हो जाते हैं। पुरी के श्रीमंदिर के रत्नसिंहासन पर विराजमान दारु-ब्रह्म भगवान जगन्नाथ के भीतर एक ऐसा अलौकिक तत्व प्रतिष्ठित है, जिसे शास्त्र और लोक-परंपरा में 'नाभि-मणि' अथवा 'ब्रह्म पदार्थ' कहा जाता है। यह नाभि-मणि क्या है, कैसे द्वारकाधीश श्रीकृष्ण का नश्वर देहावसान इस दारु-प्रतिमा का प्राण बना, और किस प्रकार शबरों के गुप्त देवता 'नीलमाधव' सम्पूर्ण जगत के नाथ 'जगन्नाथ' बनकर रथ पर आरूढ़ हुए—यह गाथा भक्ति, रहस्य और दिव्य समर्पण का अनुपम संगम है।

भगवान जगन्नाथ के नाभि-मणि का गूढ़ रहस्य: क्या है दारु-विग्रह में धड़कता ब्रह्म पदार्थ?

श्रीमंदिर में पूजित भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के काष्ठ विग्रहों के भीतर नाभि स्थल पर एक गुप्त और अत्यंत पवित्र वस्तु स्थापित रहती है, जिसे 'नाभि-मणि' या 'ब्रह्म पदार्थ' की संज्ञा दी गई है। स्कंद पुराण (उत्कल खण्ड) और महाभारत के मौसल पर्व की मान्यताओं के अनुसार, यह नाभि-मणि कोई साधारण पाषाण या आभूषण नहीं, अपितु स्वयं पूर्णब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण का अमर, स्पंदनशील 'हृदय' है।

द्वापर युग के अंत में जब प्रभास क्षेत्र में एक जरा नामक व्याध का तीर प्रभु के चरण-कमल में लगा, तब लीलाधर श्रीकृष्ण ने अपने पार्थिव शरीर का त्याग कर वैकुंठ प्रयाण किया। पाण्डवों में श्रेष्ठ अर्जुन ने जब प्रभास तीर्थ में श्रीकृष्ण के पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार किया, तब चिता की प्रचंड अग्नि ने उनके सम्पूर्ण दिव्य देह को तो पंचतत्व में विलीन कर दिया, किंतु उनका हृदय-कमल वैसा का वैसा ही जीवित, रक्त-वर्ण और स्पंदनशील बना रहा। अग्निदेव उस परम ब्रह्म के प्रेम-स्वरूप हृदय को भस्म करने में असमर्थ रहे।

महाभारत और उत्कल परंपरा के अनुसार, अर्जुन ने आकाशवाणी के निर्देश पर उस दिव्य, अजन्मा और अमर हृदय को एक काष्ठ के संदूक में सुरक्षित रखकर समुद्र के जल में प्रवाहित कर दिया। वही काष्ठ-खंड युगों की यात्रा करते हुए कलिंग (ओडिशा) के समुद्र तट पर पहुँचा, जो कालांतर में दारु-ब्रह्म के रूप में प्रकट हुआ और भगवान जगन्नाथ के विग्रह की नाभि में सदा के लिए प्रतिष्ठित हो गया। आज भी सेवायत मानते हैं कि भगवान की काष्ठ प्रतिमा के भीतर वह नाभि-मणि साक्षात जीवित हृदय की भांति स्पंदित होती है।

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नीलमाधव की खोज: शबर राज विश्वावसु और ब्राह्मण विद्यापति की कथा

भगवान जगन्नाथ के पुरी में दारु-विग्रह के रूप में प्रकट होने से पूर्व, वे उत्कल के घने नीलगिरि वनों में 'नीलमाधव' के रूप में पूजे जाते थे। ब्रह्म पुराण एवं स्कंद पुराण में वर्णित है कि मालव देश (उज्जयिनी) के परम विष्णु-भक्त राजा इन्द्रद्युम्न को स्वप्न में भगवान विष्णु ने दर्शन देकर संकेत दिया कि वे समुद्र तटवर्ती नीलगिरि पर्वत पर नीलमणि स्वरूप 'नीलमाधव' के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

राजा इन्द्रद्युम्न ने अपने कुलगुरु के अनुज, प्रकांड विद्वान ब्राह्मण विद्यापति को उस दिव्य स्वरूप की खोज में भेजा। विद्यापति अनेक मास तक वनों, पर्वतों और बीहड़ों में भटकते हुए अंततः शबरों (आदिवासियों) की बस्ती में पहुँचे। वहाँ के शबर राजा विश्वावसु अत्यंत धर्मनिष्ठ और भगवत्कृपा के पात्र थे। वे प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में वन की एक अत्यंत दुर्गम गुफा में जाते थे और सायंकाल सुगंधित पुष्पों व दिव्य प्रसादों के साथ लौटते थे।

विद्यापति समझ गए कि विश्वावसु ही प्रभु नीलमाधव के परम गोपनीय उपासक हैं। विश्वावसु ने अतिथि सत्कार के नियमों का पालन करते हुए विद्यापति को अपने घर में आश्रय दिया। विद्यापति ने विश्वावसु से प्रभु नीलमाधव के दर्शन कराने की बारंबार प्रार्थना की। आरंभ में विश्वावसु ने मना किया, किंतु अपनी पुत्री ललिता के अनुनय-विनय और विद्यापति के अटल भक्ति-भाव को देखकर वे सहमत हुए, परंतु उन्होंने एक कठोर शर्त रखी:

"हे ब्राह्मण! मैं तुम्हें नीलमाधव की गुफा तक ले चलूँगा, किंतु मार्ग की गोपनीयता भंग न हो, इसलिए तुम्हारी आँखों पर सूती पट्टी बाँध दी जाएगी। तुम केवल गुफा में ही अपनी आँखें खोल सकोगे।"

सरसों के दानों की युक्ति और प्रभु का अंतर्धान होना

विद्यापति अत्यंत चतुर और समर्पित भक्त थे। उन्होंने विश्वावसु की पुत्री ललिता की सहायता से अपने उत्तरीय (वस्त्र) में सरसों के सूखे बीज बाँध लिए। यात्रा के दौरान, जब वे विश्वावसु के साथ आँखों पर पट्टी बाँधकर बीहड़ रास्तों से गुफा की ओर बढ़ रहे थे, तब वे मार्ग भर एक-एक सरसों का दाना धरती पर गिराते चले गए। वर्षा ऋतु के आगमन के साथ उन बीजों से पीले फूलों के पौधे उग आए, जिससे गुफा का मार्ग स्वतः प्रकट हो गया।

जब गुफा के भीतर विद्यापति की आँखों की पट्टी खोली गई, तो वे स्तब्ध रह गए। वहाँ साक्षात नील-पाषाण से निर्मित, चतुर्भुज स्वरूप, शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी परम तेजस्वी भगवान नीलमाधव विराजमान थे। विद्यापति ने भावविभोर होकर उनकी स्तुति की। दर्शन के पश्चात विद्यापति ने उज्जयिनी लौटकर राजा इन्द्रद्युम्न को सारा वृत्तांत सुनाया। राजा इन्द्रद्युम्न अपनी विशाल सेना और दलबल के साथ नीलगिरि पहुँचे, किंतु जैसे ही वे गुफा में प्रविष्ट हुए, भगवान नीलमाधव वहाँ से अंतर्धान हो चुके थे। केवल एक शून्य शिला वहाँ शेष थी।

राजा इन्द्रद्युम्न विलाप करते हुए भूमि पर गिर पड़े। उन्होंने अन्न-जल त्यागकर अनशन आरंभ कर दिया। तब करुणानिधान प्रभु ने आकाशवाणी के माध्यम से कहा: "हे राजन! शोक मत करो। कलियुग में मेरी यह पाषाणमयी नीलमाधव मूर्ति यहाँ गुप्त रहेगी। अब मैं दारु-ब्रह्म के रूप में प्रकट होऊँगा, ताकि सम्पूर्ण जगत के भक्त—चाहे वे किसी भी वर्ण या जाति के हों—मेरे दर्शन पा सकें। तुम समुद्र तट पर जाओ, वहाँ तुम्हें बांकी मुहाणा नामक स्थान पर एक अलौकिक काष्ठ (दारु) तैरता हुआ मिलेगा।"

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दारु-ब्रह्म का प्राकट्य और शिल्पी की 21 दिनों की शर्त

राजा इन्द्रद्युम्न ने पुरी के समुद्र तट पर जाकर देखा तो सचमुच एक विशाल, सुगंधित और तेजोमय नीम का वृक्ष (दारु) जल में तैर रहा था, जिस पर शंख, चक्र, गदा और पद्म के प्राकृतिक चिन्ह अंकित थे। राजा के अनेक बलशाली सैनिक और हाथी मिलकर भी उस काष्ठ को जल से बाहर न निकाल सके।

तब राजा को अपनी त्रुटि का भान हुआ। उन्होंने प्रभु के अनन्य शबर भक्त विश्वावसु को आदरपूर्वक आमंत्रित किया। जब विश्वावसु ने एक ओर से और ब्राह्मण विद्यापति ने दूसरी ओर से उस पवित्र काष्ठ को छुआ, तो वह अत्यंत हल्का हो गया और सहज ही किनारे पर आ गया। यह घटना स्पष्ट करती है कि भगवान जगन्नाथ की सेवा में ज्ञान (ब्राह्मण) और निष्काम प्रेम-भक्ति (शबर) का समान अधिकार है।

काष्ठ को नगर में लाने के बाद समस्या यह आई कि कोई भी साधारण बढ़ई या मूर्तिकार उस दिव्य दारु पर अपनी छेनी नहीं चला पा रहा था; जो भी औजार उस पर लगता, वह टूट जाता। तभी स्वयं देव-शिल्पी विश्वकर्मा एक वृद्ध बढ़ई 'अनंत महाराणा' का वेष धारण कर राजदरबार में उपस्थित हुए। उन्होंने राजा के सम्मुख एक अटल प्रतिज्ञा रखी:

"हे राजन! मैं इस दारु से भगवान के विग्रहों का निर्माण करूँगा, परंतु मेरी एक शर्त है। मैं 21 दिनों तक राजप्रासाद के बंद कक्ष में अकेला कार्य करूँगा। इन इक्कीस दिनों में कोई भी उस कक्ष का द्वार नहीं खोलेगा, न ही कोई भीतर झाँकेगा। यदि अवधि से पूर्व द्वार खोला गया, तो मैं उसी क्षण कार्य अधूरा छोड़कर अंतर्धान हो जाऊँगा।"

रानी गुण्डिचा की अधीरता और अधूरा किंतु पूर्ण दिव्य स्वरूप

राजा इन्द्रद्युम्न ने शर्त स्वीकार कर ली। मूर्तिकार कक्ष में प्रविष्ट हुए और द्वार भीतर से बंद कर दिया गया। पंद्रह दिनों तक कक्ष के भीतर से छेनी, हथौड़ी और काष्ठ तराशने की निरंतर ध्वनियाँ आती रहीं। किंतु चौदहवें-पंद्रहवें दिन के उपरांत कक्ष से आने वाली सभी ध्वनियाँ अकस्मात पूर्णतः बंद हो गईं।

राजा की महारानी गुण्डिचा अत्यंत चिंतित हो उठीं। उन्हें आशंका हुई कि कहीं वह वृद्ध शिल्पी भूख-प्यास से मूर्छित तो नहीं हो गया अथवा किसी संकट में तो नहीं पड़ गया। रानी की व्याकुलता और हठ के आगे विवश होकर राजा इन्द्रद्युम्न ने इक्कीस दिन पूरे होने से पूर्व ही कक्ष का द्वार खुलवा दिया। जैसे ही कपाट खुले, शिल्पी वहाँ से अदृश्य हो चुका था और वेदी पर तीन अधूरी मूर्तियाँ स्थापित थीं।

उन मूर्तियों के हाथ और पैर नहीं बने थे, कान और अंगुलियाँ स्पष्ट नहीं थीं, तथा नेत्र अत्यंत विशाल और गोलाकार थे। राजा इन्द्रद्युम्न अपने वचन-भंग के अपराध-बोध से जलने लगे और पुनः अपने प्राण त्यागने को उद्यत हो गए। उसी रात्रि प्रभु जगन्नाथ ने राजा को स्वप्न में सांत्वना देते हुए कहा:

"हे राजन! दुखी मत हो, यह कोई दोष नहीं अपितु मेरी अपनी नित्य इच्छा है। श्वेताश्वतर उपनिषद का वचन स्मरण करो—'अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः' अर्थात् परमात्मा के भौतिक हाथ-पैर नहीं होते, फिर भी वह सब कुछ ग्रहण करता है और सर्वत्र गमन करता है; उसके भौतिक नेत्र-कान नहीं होते, फिर भी वह ब्रह्मांड के कण-कण को देखता और सुनता है। मेरा यह हस्त-पाद विहीन, गोल-नेत्रों वाला स्वरूप मेरे निर्गुण और सगुण के समन्वय का सनातन प्रमाण है।"

उसी दारु-विग्रह के नाभि-स्थल में प्रभास से आए अमर 'ब्रह्म पदार्थ' (नाभि-मणि) को पूर्ण वैदिक और तांत्रिक विधान के साथ स्थापित किया गया।

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नवकलेवर का अलौकिक विधान: कैसे बदलता है नाभि-मणि?

काष्ठ का विग्रह होने के कारण भगवान जगन्नाथ की देह नित्य नहीं रखी जाती। सनातन परंपरा में जब भी आषाढ़ मास में अधिकमास (मलमास या पुरुषोत्तम मास) आता है—जो सामान्यतः 8, 12 या 19 वर्षों के अंतराल पर घटित होता है—तब 'नवकलेवर' (नया शरीर धारण करने) का अनुष्ठान किया जाता है। यह मानव जीवन के 'वासांसि जीर्णानि यथा विहाय' के दार्शनिक सिद्धांत का प्रत्यक्ष देव-चरित्र है।

नवकलेवर की प्रक्रिया अत्यंत रहस्यमयी और गुप्त होती है। इस महापर्व के दौरान नाभि-मणि (ब्रह्म पदार्थ) के स्थानांतरण का विशेष विधान निम्नलिखित चरणों में सम्पन्न होता है:

  • वनयाग यात्रा: दैतापति सेवक वनों में जाकर चार विशेष नीम के पवित्र वृक्षों (दारु) का चयन करते हैं, जिनमें विशिष्ट लक्षण, सर्प-संरक्षण और कोई घोंसला न होना अनिवार्य होता है।
  • गोपनीय नक्काशी: कोयली बैकुंठ (मंदिर के गुप्त प्रांगण) में पुराने विग्रहों के अनुरूप नए विग्रह तराशे जाते हैं।
  • महा-मध्यरात्रि का स्थानांतरण: आषाढ़ कृष्ण चतुर्दशी की गहन रात्रि में सम्पूर्ण पुरी नगर की बिजली बंद कर दी जाती है। श्रीमंदिर में घोर अंधकार छा जाता है और चारों ओर सुरक्षा बल तैनात होते हैं।
  • दृष्टिहीन और स्पर्शहीन विधान: केवल मुख्य दैतापति सेवक गर्भगृह में प्रवेश करते हैं। उनकी आँखों पर सात परतों वाली रेशमी पट्टी बाँधी जाती है और हाथों को मोटे वस्त्रों से लपेट दिया जाता है ताकि वे उस दिव्य पदार्थ को न देख सकें और न ही त्वचा से सीधे स्पर्श कर सकें।
  • ब्रह्म पदार्थ का परिवर्तन: पुराने जीर्ण विग्रह के नाभि-विवर से नाभि-मणि को निकालकर नए विग्रह की नाभि में प्रतिष्ठित किया जाता है। सेवक बताते हैं कि वस्त्रों के भीतर से भी वह पदार्थ जीवित पक्षी या धड़कते हुए कोमल हृदय की तरह स्पंदित अनुभव होता है।
  • पाताल समाधि: नाभि-मणि निकाले जाने के उपरांत पुराने काष्ठ विग्रह निर्जीव हो जाते हैं, जिन्हें कोयली बैकुंठ में वैदिक रीति से ससम्मान समाधि दी जाती है।

नीलमाधव से रथयात्रा तक: जब स्वयं गर्भगृह से बाहर आते हैं जगन्नाथ

नीलमाधव जहाँ एक गुप्त गुफा में केवल एक अनन्य भक्त विश्वावसु द्वारा पूजे जाते थे, वहीं भगवान जगन्नाथ के रूप में प्रभु ने स्वयं को सम्पूर्ण चराचर जगत के लिए सुलभ बना दिया। जगन्नाथ का शाब्दिक अर्थ ही है 'जगत के नाथ'। श्रीमंदिर के गर्भगृह में जहाँ रूढ़ियों और नियमों के कारण समाज के सभी वर्गों का प्रवेश सुगम नहीं था, वहाँ प्रभु ने स्वयं अपनी प्रिय रानी गुण्डिचा को वचन दिया था कि वे प्रतिवर्ष अपने भक्तों से मिलने स्वयं बाहर आएँगे।

यही कारण है कि प्रतिवर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को विश्व-प्रसिद्ध 'रथयात्रा' का आयोजन होता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ 'नंदीघोष' रथ पर, बड़े भ्राता बलभद्र 'तालध्वज' रथ पर और बहन सुभद्रा 'दर्पदलन' रथ पर आरूढ़ होकर बड़दाण्ड (ग्रैंड रोड) पर निकलते हैं।

रथयात्रा का यह दर्शन सनातन धर्म के उस परम सत्य को रेखांकित करता है कि ईश्वर किसी एक कुल, वर्ग या सम्प्रदाय की जागीर नहीं हैं। जो प्रभु कभी नीलमाधव बनकर शबरों के वन में कंद-मूल का भोग लगाते थे, वही प्रभु रथ पर बैठकर पतित-पावन रूप में हर दीन-दुखी, आबाल-वृद्ध को दर्शन देकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं। भगवान जगन्नाथ की नाभि में धड़कता वह अमर 'नाभि-मणि' वास्तव में समूचे ब्रह्मांड के प्रति श्रीकृष्ण के अविरल, करुणामयी और कभी न समाप्त होने वाले प्रेम की शाश्वत धड़कन है।