ज्योतिष पर भरोसा करें या भगवान पर? कर्म, भाग्य और हरि-इच्छा का सनातन सत्य

सनातन धर्म में सबसे अधिक पूछा जाने वाला और सबसे अधिक भ्रम पैदा करने वाला प्रश्न यही है —
“ज्योतिष पर भरोसा करें या भगवान पर?”
अगर जो होना है वही होना है, तो फिर उपाय क्यों?
अगर सब कुछ राम या हरि की इच्छा से है, तो फिर कर्म, पुरुषार्थ और ज्योतिष का क्या अर्थ?
यह प्रश्न आज का नहीं है। यह वही प्रश्न है जो अर्जुन ने युद्धभूमि में पूछा था, जिसे गोस्वामी तुलसीदास ने लोकभाषा में रखा और जिसे उपनिषदों ने ब्रह्म-सूत्रों में समझाया। समस्या शास्त्रों में नहीं, हमारी अधूरी समझ में है।
“होइहि सोइ जो राम रचि राखा” — सबसे अधिक गलत समझा गया दोहा
रामचरितमानस का यह दोहा सामान्य जन में भाग्यवाद का प्रतीक बन चुका है:
होइहि सोइ जो राम रचि राखा।
को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
अधिकांश लोग इसका अर्थ यह मान लेते हैं कि —
जो होना है, वह होकर रहेगा; मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकता।
लेकिन यह अर्थ न अधूरा है, बल्कि खतरनाक भी।
यह अर्थ मनुष्य को कर्महीन, प्रयासहीन और उत्तरदायित्वहीन बना देता है।
तात्त्विक रूप से यहाँ “राम” किसी एक ऐतिहासिक व्यक्ति तक सीमित नहीं हैं।
राम = ईश्वरीय व्यवस्था (Cosmic Order)
और “राम रचि राखा” का अर्थ है —
ईश्वर ने यह संसार कर्म और फल के नियम पर रचा है।
अर्थात् जो भी होता है, वह ईश्वर की बनाई हुई व्यवस्था के अनुसार होता है,
लेकिन उस व्यवस्था का आधार कर्म है।
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तुलसीदास जी स्वयं भाग्यवाद को नकारते हैं
उसी ग्रंथ में तुलसीदास जी स्पष्ट कहते हैं:
करम प्रधान विश्व करि राखा।
जो जस करहिं सो तस फल चाखा॥
यह दोहा पहले दोहे की व्याख्या है, उसका खंडन नहीं।
यह स्पष्ट करता है कि संसार भाग्य प्रधान नहीं, कर्म प्रधान है।
यदि सब कुछ पहले से तय होता,
तो यह दोहा निरर्थक हो जाता।
यहाँ सनातन धर्म का स्पष्ट संदेश है —
ईश्वर नियम बनाता है,
फल मनुष्य के कर्म तय करते हैं।
भगवद्गीता — भाग्य का नहीं, कर्म का शास्त्र
भगवद्गीता को केवल भक्ति ग्रंथ समझ लेना एक बड़ी भूल है।
गीता मूलतः कर्म-दर्शन है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ (2.47)
इस श्लोक में श्रीकृष्ण तीन बातें स्पष्ट करते हैं:
पहला — मनुष्य को कर्म करने का पूरा अधिकार है।
यह Free Will का सीधा प्रमाण है।
दूसरा — फल पर अधिकार नहीं, क्योंकि फल कई तत्वों से तय होता है — कर्म, समय, परिस्थितियाँ और ईश्वरीय न्याय।
तीसरा — अकर्म, अर्थात् कर्म छोड़ देना, अधर्म है।
केवल भाग्य या ईश्वर के भरोसे बैठ जाना पाप के समान है।
अगर सब ईश्वर की इच्छा से है, तो कर्म क्यों?
गीता इस प्रश्न का उत्तर भी देती है:
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥ (18.61)
ईश्वर हर प्राणी के हृदय में स्थित है,
लेकिन वह मनुष्य को मनमाना नहीं चलाता।
यहाँ “यंत्र” शरीर है,
और “भ्रामयन्” का अर्थ है —
कर्मानुसार गति देना।
ईश्वर निर्णयकर्ता है,
लेकिन निर्णय कर्म के आधार पर होता है।
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भाग्य क्या है? क्या वह बदला जा सकता है?
सनातन धर्म में भाग्य को कभी भी एक जड़, पत्थर की लकीर या अपरिवर्तनीय नियति नहीं माना गया।
भाग्य को लेकर सबसे बड़ी भ्रांति यही है कि लोग उसे “पहले से तय” मानकर कर्म से पलायन कर लेते हैं।
जबकि शास्त्रों के अनुसार भाग्य कोई स्थिर शक्ति नहीं, बल्कि कर्मों की गतिशील परिणति है।
सनातन दर्शन भाग्य को समझाने के लिए उसे तीन स्तरों में विभाजित करता है। यह विभाजन केवल दार्शनिक नहीं, बल्कि अत्यंत व्यावहारिक है।
1. संचित कर्म — पूर्व जन्मों का संग्रह
संचित कर्म वह विशाल भंडार है, जिसमें हमारे असंख्य जन्मों के किए गए शुभ और अशुभ कर्म संग्रहीत रहते हैं।
यह कर्म तत्काल फल नहीं देते, बल्कि समय की प्रतीक्षा करते हैं।
इन्हीं कर्मों के आधार पर अगला जन्म, परिस्थितियाँ, शरीर, परिवार और संस्कार प्राप्त होते हैं।
संचित कर्म समुद्र के समान हैं—
हम उनमें से केवल उतना ही भोगते हैं, जितना इस जन्म में आवश्यक है।
2. प्रारब्ध कर्म — इस जन्म का भोग
संचित कर्मों में से जो कर्म इस जन्म में भोगने के लिए परिपक्व हो जाते हैं, वही प्रारब्ध कर्म कहलाते हैं।
यही प्रारब्ध कर्म जन्म के साथ हमारे जीवन में प्रवेश करता है।
ज्योतिष शास्त्र मुख्य रूप से इसी प्रारब्ध को पढ़ता है।
जन्मकुंडली, ग्रहों की स्थिति, दशाएँ—ये सब यह संकेत देती हैं कि कौन-सा कर्म किस समय फलित होगा।
प्रारब्ध को पूरी तरह टाला नहीं जा सकता,
लेकिन उसकी तीव्रता, दिशा और अनुभव अवश्य बदला जा सकता है।
यही कारण है कि एक ही ग्रह-दशा में
कोई व्यक्ति टूट जाता है,
तो कोई उसी दशा में आध्यात्मिक ऊँचाई पर पहुँच जाता है।
3. क्रियमाण कर्म — वर्तमान का निर्माण
क्रियमाण कर्म वह शक्ति है, जिसे सनातन धर्म सबसे अधिक महत्व देता है।
ये वे कर्म हैं, जो हम अभी, इसी क्षण कर रहे हैं—अपने विचारों से, कर्मों से और भावनाओं से।
यही क्रियमाण कर्म भविष्य का निर्माण करते हैं।
यही कर्म यह तय करते हैं कि प्रारब्ध का फल
दुख बनकर आएगा या शिक्षा बनकर।
इसलिए यह कहना कि “भाग्य बदला नहीं जा सकता”
सनातन दृष्टि से अधूरा और भ्रमित कथन है।
महाभारत में स्पष्ट कहा गया है—
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।
अर्थात् लक्ष्मी उसी पुरुष के पास जाती है जो प्रयास करता है, जो पुरुषार्थ करता है।
यह श्लोक भाग्यवाद को नहीं,
कर्मवाद को प्रतिष्ठित करता है।
ज्योतिष क्या है — अंधविश्वास या विज्ञान?
आज के समय में ज्योतिष को लेकर समाज में दो बिल्कुल विपरीत धारणाएँ दिखाई देती हैं।
एक वर्ग ऐसा है जो ज्योतिष को ही सब कुछ मान लेता है—हर निर्णय, हर समस्या और हर समाधान के लिए केवल कुंडली और ग्रहों पर निर्भर हो जाता है।
दूसरा वर्ग ऐसा है जो ज्योतिष को पूरी तरह अंधविश्वास कहकर नकार देता है और उसे विज्ञान के विरुद्ध मानता है।
वास्तव में, ये दोनों ही दृष्टियाँ अधूरी हैं।
सनातन धर्म किसी भी विषय को अतिवाद से नहीं, बल्कि संतुलन से देखता है।
वेदों में ज्योतिष के विषय में एक अत्यंत महत्वपूर्ण वाक्य मिलता है—
“ज्योतिषं वेदस्य चक्षुः”
अर्थात् ज्योतिष वेदों की आँख है।
अब यहाँ “आँख” शब्द को समझना आवश्यक है।
आँख का कार्य क्या है?
आँख हमें रास्ता दिखाती है—कहाँ गड्ढा है, कहाँ मोड़ है, कहाँ रुकना चाहिए और कहाँ सावधानी बरतनी चाहिए।
लेकिन आँख स्वयं चल नहीं सकती।
चलना तो व्यक्ति को अपने पैरों से ही पड़ता है।
ठीक यही भूमिका ज्योतिष की है।
ज्योतिष हमें जीवन के मार्ग में आने वाली संभावनाओं, चुनौतियों और समय की प्रकृति का संकेत देता है।
यह चेतावनी देता है, मार्गदर्शन करता है और सावधान करता है—
लेकिन कर्म करने की जिम्मेदारी मनुष्य की ही रहती है।
इसलिए यह समझना बहुत आवश्यक है कि
ज्योतिष भविष्य “निर्माण” नहीं करता।
ज्योतिष केवल यह बताता है कि हमारे पूर्व और वर्तमान कर्मों का फल
किस समय, किस परिस्थिति में और किस रूप में सामने आ सकता है।
जो व्यक्ति ज्योतिष को समझकर भी कर्म नहीं करता,
वह उस यात्री के समान है
जो रास्ता साफ़ देख रहा है, फिर भी आगे बढ़ने से इंकार कर देता है।
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ग्रह क्या हैं? क्या वे दुख देते हैं?
अक्सर लोगों को कहते सुना जाता है—
“शनि बहुत मार रहा है”,
“राहु खराब चल रहा है”,
“ग्रह शत्रु बन गए हैं”।
शास्त्र इस प्रकार की सोच को अज्ञान मानते हैं।
ज्योतिष शास्त्र में स्पष्ट कहा गया है—
“ग्रहाः कर्मफलदाता:”
अर्थात् ग्रह केवल कर्म का फल देने वाले हैं।
ग्रह न तो हमारे मित्र हैं
और न ही शत्रु।
वे किसी को जानबूझकर कष्ट नहीं देते
और न ही बिना कारण कृपा करते हैं।
ग्रहों की भूमिका एक न्यायाधीश के समान है।
जैसे न्यायालय में निर्णय व्यक्ति के कर्मों और प्रमाणों के आधार पर होता है,
वैसे ही ग्रह हमारे ही किए गए कर्मों की “फाइल” खोलते हैं
और नियत समय आने पर उसका परिणाम हमारे सामने रखते हैं।
इसे सरल शब्दों में इस प्रकार समझा जा सकता है—
- दशा — समय का संकेत है
- ग्रह — माध्यम हैं
- फल — हमारे कर्मों का परिणाम है
यदि किसी व्यक्ति के कर्म शुभ हैं,
तो वही ग्रह जीवन में सहायक बन जाते हैं,
उन्नति और संरक्षण देने लगते हैं।
और यदि कर्म अशुभ हैं,
तो वही ग्रह कठिन अनुभव कराते हैं,
ताकि व्यक्ति अपने कर्मों और चेतना को सुधारे।
इसलिए दोष ग्रहों में नहीं होता,
दोष सदैव कर्मों में होता है।
उपाय क्यों? क्या उपाय ग्रह बदलते हैं?
यह प्रश्न ज्योतिष से जुड़ा सबसे गहरा और सबसे अधिक गलत समझा गया प्रश्न है।
सच्चाई यह है कि—
उपाय ग्रहों को नहीं बदलते,
उपाय मनुष्य को बदलते हैं।
सनातन धर्म में उपायों को कभी भी “टोटका” या “जादू” नहीं माना गया।
उपायों का उद्देश्य है—
मनुष्य की चेतना, सोच और कर्मों का शुद्धिकरण।
दान, जप, तप और सेवा—
ये सभी कर्म-संशोधन की प्रक्रियाएँ हैं।
दान से मनुष्य का अहंकार कम होता है,
जप से मन की अशुद्धियाँ दूर होती हैं,
तप से संयम आता है
और सेवा से करुणा तथा सकारात्मक कर्म उत्पन्न होते हैं।
जब व्यक्ति भीतर से बदलता है,
तो वही ग्रह, वही दशा
अलग प्रकार का फल देने लगती है।
उपनिषदों में कहा गया है—
“यथा भावना तथा भवति”
जैसी भावना, वैसा ही भविष्य।
भावना बदलती है तो विचार बदलते हैं,
विचार बदलते हैं तो कर्म बदलते हैं,
और कर्म बदलते हैं तो
ग्रहों द्वारा दिया जाने वाला फल भी स्वतः बदल जाता है।
इसीलिए सनातन धर्म में उपायों को
भय से नहीं,
बल्कि चेतना-परिवर्तन की साधना के रूप में अपनाया गया है।
संक्षिप्त निष्कर्ष
सनातन दृष्टि से देखा जाए तो ज्योतिष, कर्म, भाग्य और ईश्वर एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य के अलग–अलग आयाम हैं।
भाग्य कोई स्थिर या अटल शक्ति नहीं है, बल्कि हमारे ही पूर्व और वर्तमान कर्मों का परिणाम है। ज्योतिष उस परिणाम के समय और स्वरूप को समझने का माध्यम है, न कि जीवन को चलाने वाली अंतिम सत्ता। ग्रह न तो शत्रु हैं, न दंडदाता—वे केवल हमारे कर्मों के निष्पक्ष फलदाता हैं।
उपाय ग्रहों को बदलने के लिए नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना, सोच और कर्म को शुद्ध करने के लिए होते हैं। जब भीतर परिवर्तन होता है, तभी बाहर का परिणाम भी बदलता है।
इसलिए सनातन धर्म न अंधे भाग्यवाद का समर्थन करता है, न ही कर्म-विहीन आस्था का। वह सिखाता है—कर्म करो, विवेक रखो, ज्योतिष से मार्गदर्शन लो और ईश्वर पर विश्वास रखते हुए स्वयं को बेहतर बनाते चलो। यही इस पूरे चिंतन का सार और सत्य निष्कर्ष है।



