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संत तुकाराम का जीवन और भक्ति मार्ग

संत तुकाराम का नाम लेते ही विठोबा-विट्ठल के चरणों में डूबी हुई सरल, निष्कपट भक्ति की छवि आँखों के सामने आ जाती है। "तुका म्हणे माझे काही नाही, सर्व काही विठ्ठलाचे" कहने वाले इस महान संत ने महाराष्ट्र ही नहीं, पूरे भारत के भक्ति-साहित्य और नामसंकीर्तन परंपरा को नया जीवन दिया।

यह लेख विशेष रूप से इस प्रश्न का उत्तर देता है कि संत तुकाराम का जीवन कैसा था और उन्होंने भक्ति मार्ग को कैसे जिया और सिद्ध किया? इसलिए पहले हम उनके जीवन की मुख्य घटनाओं, फिर उनकी भक्ति-साधना, अभंग-रचना, विठोबा से उनके अंतरंग संबंध और अंत में वैकुंठ-गमन की कथा को विस्तार से समझेंगे।

संत तुकाराम का जन्म, परिवार और आरंभिक जीवन

परंपरागत जीवनीकार महिपति के अनुसार संत तुकाराम का जन्म 1608 ईस्वी के आसपास पुणे जिले के देहू (देवीहू) गाँव में, इंद्रायणी नदी के तट पर हुआ। कुछ वंशावलियाँ 1598 ईस्वी का वर्ष बताती हैं, किंतु साधारणतः 17वीं शताब्दी का प्रथम भाग ही स्वीकृत है। वे कुंबी जाति के एक व्यापारी परिवार में जन्मे; उनके पिता का नाम बोलहोबा अंबिल्मोरे था जो गाँव के महाजन (स्थानीय साहूकार और प्रतिष्ठित गृहस्थ) माने जाते थे।

तुकाराम की माता कन्होबाई धर्मनिष्ठ, दयालु और विठोबा की भक्त थीं। घर में भक्ति का वातावरण था, पर साथ ही व्यापार, खेत-खलिहान और सामाजिक प्रतिष्ठा की व्यस्तता भी थी। तुकाराम ने बाल्यकाल से ही पंढरपुर के विठोबा, वारकरी-संत परंपरा और नामस्मरण की महिमा सुनी। संत ज्ञानेश्वर, नामदेव आदि की कथाएँ उनके लिए प्रेरणा बनीं।

यौवन में प्रवेश करते-करते वे परिवार के कामकाज में लग गए। विवाह रखमाबाई से हुआ, बाद में अवलीबाई (जीजाबाई) से दूसरा विवाह भी हुआ, जो आगे चलकर उनकी साधना में महत्त्वपूर्ण सहचरी बनीं। उस समय तक उनका जीवन एक साधारण गृहस्थ की तरह था – व्यापार, परिवार, ग्राम-जीवन और भगवान के प्रति सामान्य श्रद्धा। अभी तक वह तीव्र, सर्वग्रासी भक्ति-ज्वाला जागृत नहीं हुई थी, जो आगे चलकर उन्हें संतों की श्रेणी में ले जाने वाली थी।

अकाल, दुख और वैराग्य: भक्ति मार्ग की निर्णायक शुरुआत

संतों के जीवन में अक्सर कोई एक गहन दुख, एक भीषण झटका, उन्हें भीतर से तोड़कर भगवान के चरणों में पूरी तरह समर्पित कर देता है। संत तुकाराम के जीवन में यह मोड़ 1629-30 के भीषण अकाल के रूप में आया। इतिहासकारों के अनुसार उस वर्ष दक्खन क्षेत्र में भयंकर सूखा पड़ा, जिससे अन्न का संकट, रोग और मृत्यु का तांडव मच गया।

तुकाराम का व्यापार चौपट हो गया, कर्ज बढ़ता गया, और अंततः स्थिति इतनी विकट हुई कि उनकी पहली पत्नी और एक पुत्र भूख और कष्ट के कारण चल बसे। माता-पिता भी लगभग इसी समय दिवंगत हुए, जिससे समस्त पारिवारिक जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ पड़ी। यह सब देखकर उनका हृदय संसार से विरक्त होने लगा।

यही वह निर्णायक क्षण था जब वे भीतर से पुकारने लगे – "अब मनुष्य पर, धन पर, व्यापार पर भरोसा नहीं, केवल विठोबा ही शरण हैं।" वैराग्य की यह अग्नि ही उनके भक्ति मार्ग की वास्तविक शुरुआत बनी। यह प्रसंग हमें श्रीमद्भागवत महापुराण की उस शिक्षा की याद दिलाता है कि संसार के दुख ही जीव को भगवद्-शरणागति की ओर धकेलते हैं – "तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदः" – बुद्धिमान वही है जो इन दुखों का उपयोग परमात्मा की खोज के लिए करे।

देहू की पहाड़ी पर तपस्या, गुरु-मंत्र और नामस्मरण

अकाल और शोक के बाद तुकाराम ने धीरे-धीरे व्यावसायिक जीवन से हाथ खींचना शुरू किया और देहू के समीप एक पहाड़ी (भंडारा डोंगर) पर जाकर एकांत साधना करने लगे। वारकरी परंपरा की जीवनी-कथाओं में आता है कि वे वहाँ घंटों और दिनों तक विठ्ठल का स्मरण करते, रोते, गाते और अपने हृदय का दर्द प्रभु के सामने उँडेल देते।

इसी काल में, एक श्रावण मास में, उन्हें स्वप्न या अंतर्यामी अनुभूति के माध्यम से गुरु-मंत्र की प्राप्ति हुई। परंपरा के अनुसार किसी संत-स्वरूप बाबाजी ने स्वप्न में उन्हें "राम कृष्ण हरि" नाम का जप-मंत्र दिया। यह वही नाम-स्मरण है जिसका उल्लेख श्रीमद्भागवत महापुराण और आगे चलकर नामदेव व अन्य वारकरी संतों की वाणी में मिलता है – कि कलियुग में केवल हरि-नाम ही सबसे सरल, सुलभ और शक्तिशाली साधन है।

तब से संत तुकाराम ने जीवन का केंद्र बना लिया – निरंतर नामस्मरण, भजन-कीर्तन और विठोबा का ध्यान। वे खेतों में जाएँ तो भी नाम जपते, गाँव से बाहर निकलें तो भी नाम जपते। जैसे वाल्मीकि रामायण के सुन्दरकाण्ड में हनुमान जी का हर कृत्य राम-स्मरण से ओतप्रोत है – समुद्र लाँघना, अशोक वाटिका में सीता-जी को ढूँढना, राम-मुद्रिका देना और लंका-दहन – सब राम-भक्ति के बल पर; वैसे ही तुकाराम का प्रत्येक कर्म "विठ्ठल-विठ्ठल" से भरा हुआ हो गया।

अभंग-रचना: संत तुकाराम की भक्ति का प्राण

इसी नामस्मरण और अंतर्मंथन की अग्नि में से निकला संत तुकाराम का अद्वितीय साहित्य – अभंग। "अभंग" अर्थात् जो भंग (टूट) न हो सके; ऐसा गीत, ऐसी वाणी जो काल, परिस्थिति और संकीर्णता से परे हो। विद्वान मानते हैं कि उन्होंने लगभग 4,100 से 4,650 अभंगों की रचना की, जो आज "तुकाराम गाथा" के नाम से विख्यात है।

इन अभंगों में उनकी भक्ति, वैराग्य, सामाजिक दृष्टि, आत्म-स्वीकार और विठोबा के प्रति प्रेम सब एक साथ दिखाई देते हैं। वे किसी पंडितीय संस्कृत में नहीं, बल्कि सामान्य मराठी भाषा में हैं, ताकि गाँव का साधारण किसान, मजदूर, स्त्री-पुरुष सब उन्हें समझ सकें। यह वही आदर्श है जिसे भगवद्गीता में श्रीकृष्ण "स्वधर्म" के रूप में बताते हैं – अपनी प्रकृति और लोक की भाषा में ही परमात्मा की ओर बढ़ना।

तुकाराम के कई अभंगों में वे स्वयं को दोष देते हैं – अपने आलस्य, क्रोध या कामनाओं को स्वीकारते हैं, और विठोबा से विनती करते हैं कि "मुझे छोड़ मत देना।" यह आत्म-स्वीकार उनकी भक्ति की सच्चाई को और गहरा बनाता है। जैसे एक स्थान पर वे कहते हैं – "तुका म्हणे माझे काही नाही, सर्व काही विठ्ठलाचे" – यह पूर्ण शरणागति का घोष है, जो श्रीमद्भागवत महापुराण के "एकान्ति-भक्ति" आदर्श से पूरी तरह मेल खाता है।

भक्ति मार्ग की विशेषताएँ: सरलता, नामसंकीर्तन और सामाजिक जागरण

संत तुकाराम का भक्ति मार्ग केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं रहा, वह समाज के लिए भी प्रकाश बन गया। उनकी भक्ति के कुछ मुख्य आयाम इस प्रकार हैं:

१. नामस्मरण और नामसंकीर्तन

तुकाराम ने हरि-नाम को ही सब साधनों का सार बताया। जैसे श्रीमद्भागवत महापुराण में कलियुग के लिए कीर्तन-योग की महिमा गाई गई है, वैसे ही वे गाँव-गाँव में भजन-कीर्तन करते, सबको "राम कृष्ण हरि" और "विठ्ठल-विठ्ठल" का जप सिखाते। उनके लिए यह केवल पूजा नहीं, जीवन जीने का तरीका था – चलते, बोलते, काम करते हर क्षण नाम का सहारा।

२. गृहस्थ में रहकर भक्ति

तुकाराम ने सन्यास नहीं लिया। वे पत्नी, बच्चों, गाँव और व्यापारिक जिम्मेदारियों के बीच रहते हुए भी सच्चे संत बने। यह आदर्श भगवद्गीता के कर्मयोग से मेल खाता है – जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि युद्ध-क्षेत्र में रहकर भी मन से भगवान में स्थित रहो। तुकाराम के लिए गृहस्थ-धर्म, परिवार की सेवा, अतिथि-सत्कार – सब विठोबा की ही सेवा थे।

३. जाति-भेद और कर्मकाण्ड की आलोचना

वारकरी संत परंपरा की तरह तुकाराम ने भी जाति-भेद, ऊँच-नीच, बाह्य आडंबर और अत्यधिक कर्मकाण्ड का विरोध किया। उनके अभंगों में बार-बार यह स्वर आता है कि भगवान को न तो ऊँचे कुल की आवश्यकता है, न विशेष वेशभूषा की; वह तो केवल निर्मल हृदय और नामस्मरण से प्रसन्न होते हैं। यह दृष्टि श्रीमद्भागवत के उस सिद्धांत से जुड़ती है जिसमें कहा गया है कि "किरात-हूणान्… येन्ये च पापाः" – जो भी हृदय से शरणागत हो, भगवान उसे स्वीकारते हैं।

४. प्रकृति-सम्मत, सरल भक्ति

तुकाराम की भक्ति में सादगी और प्रकृति से सामंजस्य दिखता है। वे इंद्रायणी नदी के तट, देहू की मिट्टी, पेड़-पौधों, पक्षियों – सबमें विठोबा का ही दर्शन करते। यह हमें स्कंद पुराण और पद्म पुराण की उन शिक्षाओं की याद दिलाता है जहाँ मिट्टी के पात्र, भूमि और पंचतत्व को पवित्रता और ईश्वर-उपासना का प्रतीक माना गया है। जैसे स्कंद पुराण में कहा गया कि मिट्टी का पात्र जल को पवित्र बनाए रखता है और उसका विसर्जन प्रकृति के अनुकूल होता है, वैसे ही तुकाराम की भक्ति भी कृत्रिमता से रहित, धरती से जुड़ी और सभी के लिए सहज थी।

उनके लिए दीपक जलाना, नदी के तट पर बैठकर नाम जपना, मिट्टी के घर में कीर्तन करना – सब परम पवित्र साधन थे। श्रीमद्भागवत महापुराण में दीपदान को पापकर्मों का नाश करने वाला और सौभाग्य-वर्धक बताया गया है; तुकाराम के भजन-कीर्तन में भी दीप, नाम और कथा – ये तीनों मिलकर भक्तों के भीतर के अंधकार को दूर करते थे।

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विठोबा से अंतरंग संबंध: प्रत्यक्ष कृपा और लीला

वारकरी परंपरा की अनेक कथाओं में आता है कि विठोबा स्वयं तुकाराम के प्रेम से बंधकर उनसे बालक-सखा की तरह व्यवहार करते थे। यद्यपि ये प्रसंग मुख्यतः संत-चरित-साहित्य से हैं, पर उनका भाव श्रीमद्भागवत में वर्णित गोपियों और उद्धव के प्रसंगों जैसा है – जहाँ भगवान भक्त के प्रेम के आगे अपने ईश्वरत्व को भी भूल जाते हैं।

एक प्रसिद्ध कथा में आता है कि ग्राम के कुछ पंडितों और धनाढ्य लोगों ने तुकाराम की निंदा की – कि ये खेत-काम छोड़कर केवल भजन करते हैं, शास्त्र नहीं पढ़े, फिर भी उपदेश देते हैं। विवाद इतना बढ़ा कि उन्होंने तुकाराम के अभंगों की पोटली इंद्रायणी नदी में फेंक दी। तुकाराम ने इसे भी विठ्ठल की इच्छा मानकर स्वीकार किया और रोते-रोते केवल यही कहा – "हे विठ्ठल, यदि यह तेरी इच्छा है तो मुझे भी साथ ले जा।"

कथा आगे कहती है कि कुछ समय बाद वही पोटली जल से ऊपर तैरती हुई निकली, और आश्चर्य – अभंगों की पांडुलिपि भीगने पर भी अक्षर अक्षुण्ण रहे। यह घटना विठोबा की प्रत्यक्ष कृपा के रूप में मानी जाती है, जिसने आलोचकों को भी चकित कर दिया। चाहे हम इसे चमत्कार मानें या प्रतीक, संदेश स्पष्ट है – सच्ची भक्ति और निर्मल वाणी को न कोई डुबा सकता है, न मिटा सकता है।

इसी प्रकार, अनेक प्रसंगों में आता है कि विठोबा तुकाराम के घर स्वयं अतिथि के रूप में आते, या उनके खेतों की रखवाली करते, या पालखी-यात्रा में उनके साथ चलते। यह सब हमें यह समझाता है कि भक्ति का चरम यह है कि भगवान हमारे लिए "दूरस्थ ईश्वर" न रहकर "अपना" हो जाए – जैसे वाल्मीकि रामायण में हनुमानजी के लिए राम केवल राजा नहीं, स्वामी और सखा दोनों हैं।

संत तुकाराम का वैकुंठ-गमन (तुकाराम बीज)

वारकरी परंपरा में संतों के देहावसान को साधारण मृत्यु नहीं, "वैकुंठ-गमन" माना जाता है – अर्थात् देह छोड़कर भगवान के धाम में प्रवेश। संत तुकाराम के बारे में मान्यता है कि उन्होंने स्वयं विठोबा की आज्ञा से, सबको पूर्वसूचना देकर देह त्याग किया।

कथाओं के अनुसार एक दिन विठोबा ने तुकाराम से कहा – "अब तू देहू का काम पूरा कर चुका, चल मेरे धाम।" तुकाराम ने ग्रामवासियों को बुलाकर कहा कि फलाँ दिन मैं विठोबा के धाम जाऊँगा; सबको नामस्मरण, कीर्तन और सदाचार की शिक्षा दी। फिर वे कीर्तन करते-करते एक दिन आकाश में उठते हुए देखे गए – यह दिन था फाल्गुन कृष्ण पक्ष द्वितीया, जिसे आज "तुकाराम बीज" कहा जाता है। वर्तमान गणनाओं के अनुसार यह लगभग 1649-1650 ईस्वी के आसपास माना जाता है, और 2026 में यह तिथि 5 मार्च को मनाई जाएगी।

यह कथा भले ही अलौकिक लगे, पर इसका आध्यात्मिक संदेश गहरा है – जो जीवन भर नाम में डूबा रहा, जिसका मन पहले ही विठोबा के चरणों में बस चुका था, उसके लिए देह त्याग केवल वस्त्र-परिवर्तन जैसा है। जैसे भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं – "वासांसि जीर्णानि यथा विहाय" – पुरानी देह को त्यागकर जीव नई देह लेता है; संत के लिए यह नई देह सीधा भगवान के धाम में प्राप्त होती है।

आज के युग के लिए संत तुकाराम के भक्ति मार्ग की प्रासंगिकता

आज के व्यस्त, तनावपूर्ण और भौतिकतावादी जीवन में संत तुकाराम का भक्ति मार्ग हमारे लिए अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने न तो बड़े-बड़े यज्ञ किए, न कठिन वन-तपस्या; उन्होंने तो यही सिखाया कि:

  • गृहस्थ में रहकर, अपने काम-काज करते हुए भी हम नामस्मरण कर सकते हैं।
  • भक्ति के लिए कोई विशेष जाति, भाषा या विद्वत्ता आवश्यक नहीं – केवल सरल हृदय, सत्यनिष्ठा और नाम पर विश्वास चाहिए।
  • सामाजिक अन्याय, जाति-भेद और आडंबर से मुक्त होकर, सबको ईश्वर का अंश मानकर व्यवहार करना ही सच्ची भक्ति है।
  • प्रकृति के साथ सामंजस्य, सादगी और संतोष – ये भी भक्ति के अंग हैं, जैसे पुराणों में मिट्टी, जल और दीपक को पवित्रता का प्रतीक माना गया है।

यदि हम दिन भर में कुछ समय "राम कृष्ण हरि" या अपने इष्टदेव के नाम का जप कर लें, सप्ताह में कभी भजन-कीर्तन में बैठ जाएँ, परिवार के साथ सरल पूजन करें, तो हम भी धीरे-धीरे उसी नाम-रस को चख सकते हैं जो तुकाराम ने चखा।

अंततः, संत तुकाराम का जीवन हमें यही सिखाता है कि दुख और विपत्ति भी ईश्वर की ओर मोड़ने वाले साधन बन सकते हैं; यदि हम उन्हें शिकायत का नहीं, शरणागति का अवसर मानें। उनके अभंगों की पंक्तियाँ आज भी हमें पुकारती हैं – "तुका म्हणे, नाम घे रे, बाकीचे सोडून दे" – नाम ले, बाकी सब छोड़ दे; यहीं से सच्चे भक्ति मार्ग की शुरुआत होती है, और अंततः यही हमें भी, एक दिन, विठोबा के धाम की ओर ले जा सकता है।